हस्ती पब्लिक स्कूल एवं कनिष्ठ महाविद्यालय, दोनडाईचा
BLOG .NO 171
हमारा हस्ती स्कूल दृढ़ता से मानता है कि, *प्रशंसा शिक्षकों और छात्रों को प्रेरित करती है, प्रोत्साहित
करती है और ऊर्जावान बनाती है*
*प्रशंसा मुख्य प्रेरक शक्ति में से एक है जो लोगों को बेहतर प्रदर्शन के लिए उत्तेजित करती है।
छात्रों/शिक्षकों को, उनके प्रत्येक योग्य कार्य के लिए, प्रशंसा प्रमाण पत्र प्रदान किए जाते हैं
प्रशंसा प्रमाणपत्रों की संख्या वार्षिक ग्रेड तय करती है।
प्रशंसा किसी चीज या किसी को उनका उचित मूल्य देने की क्रिया है।
हम चाहते हैं कि हम जो हैं, जो हम करते हैं, और जो हम हासिल करते हैं, उसकी सराहना की जाए।
सराहना मिलने से लोगों को अच्छा लगता है। और, *जो लोग अच्छा महसूस करते हैं, वे उन भावनाओं को दूसरों तक पहुँचाने की अधिक संभावना रखते हैं, चाहे वह दयालुता, उदारता, या एक मुस्कान के यादृच्छिक कृत्यों के माध्यम से हो।
प्रशंसा अक्सर उपलब्धि और मान्यता के साथ भ्रमित होती है। वास्तविक प्रशंसा उससे भी बहुत आगे की बात है।
किसी व्यक्ति की क्षमता, व्यक्तित्व और विशिष्टता के कारण उसकी प्रशंसा होती है
सम्मान, पहचान और परोपकार, प्रशंसा दिखाने के तरीके के हैं।
प्रशंसा, रुचि, ध्यान, भक्ति और मित्रता की विशेषता है*
आम तौर पर प्रशंसा कृतज्ञता की भावना उत्पन्न करती है और जिसकी सराहना की जाती है वह कृतज्ञता की अभिव्यक्ति देता है*।
सकारात्मक मनोविज्ञान अनुसंधान में, कृतज्ञता दृढ़ता से और लगातार अधिक खुशी के साथ जुड़ी हुई है। कृतज्ञता लोगों को अधिक सकारात्मक भावनाओं को महसूस करने, अच्छे अनुभवों का आनंद लेने, उनके स्वास्थ्य में सुधार करने, प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने और मजबूत संबंध बनाने में मदद करती है।
हर बार जब हम कृतज्ञता प्राप्त करते हैं या व्यक्त करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क डोपामाइन और सेरोटोनिन जारी करता है। ये दो महत्वपूर्ण
कृतज्ञता शब्द लैटिन शब्द ग्रेटिया से लिया गया है जिसका अर्थ है अनुग्रह, अनुग्रह, या कृतज्ञता* (संदर्भ के आधार पर)
जो लोग नियमित रूप से कृतज्ञता का अभ्यास करते हैं वे अधिक सकारात्मक महसूस करते हैं, अधिक जीवित महसूस करते हैं, बेहतर नींद लेते हैं, अधिक करुणा और दया व्यक्त करते हैं और यहां तक कि मजबूत प्रतिरक्षा प्रणाली भी रखते हैं।
कृतज्ञता काम करती है क्योंकि यह धीरे-धीरे हमारे ध्यान को समायोजित करके परिस्थितियों को समझने के तरीके को बदल देती है।
कहा जाता है कि आलोचना करने में अधिक समय लगाना चाहिए लेकिन
लेकिन प्रशंसा करने में देर न करें इसे तुरंत करें
कृतज्ञता की भावना व्यक्त करने में समय बर्बाद न करें
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आज की कहानी🦚🌳
💐💐अखबार वाला💐💐
एक अखबार वाला प्रात:काल लगभग 5 बजे जिस समय अख़बार देने आता था, उस समय रमेश बाबू उसको अपने मकान की गैलरी में टहलते हुए मिल जाते थे ।
प्रतिदिन वह रमेश बाबू के आवास के मुख्य द्वार के सामने चलती साइकिल से निकलते हुए अख़बार फेंकता और उनको ‘नमस्ते बाबू जी‘ बोलकर अभिवादन करता हुआ फर्राटे से आगे बढ़ जाता था।
क्रमश: समय बीतने के साथ रमेश बाबू के सोकर उठने का समय बदलकर प्रात: 7:00 बजे हो गया।
जब कई दिनों तक रमेश बाबू उस अखबार वाले को प्रात: टहलते नहीं दिखे तो एक रविवार को प्रात: लगभग 9:00 बजे वह उनका कुशल-क्षेम लेने उनके आवास पर आ गया।
तब उसे ज्ञात हुआ कि घर में सब कुशल- मंगल है, रमेश बाबू बस यूँ ही देर से उठने लगे थे ।
वह बड़े सविनय भाव से हाथ जोड़ कर बोला, “बाबू जी! एक बात कहूँ?”
रमेश बाबू ने कहा… “बोलो”
वह बोला… “आप सुबह तड़के सोकर जगने की अपनी इतनी अच्छी आदत को क्यों बदल रहे हैं? आपके लिए ही मैं सुबह तड़के विधानसभा मार्ग से अख़बार उठा कर और फिर बहुत तेज़ी से साइकिल चलाकर आप तक अपना पहला अख़बार देने आता हूँ…सोचता हूँ कि आप प्रतीक्षा कर रहे होंगे।”
रमेश बाबू ने विस्मय से पूछा…अरे तुम ! विधान सभा मार्ग से अखबार लेकर आते हो….इतनी दूर से ?”
“हाँ ! सबसे पहला वितरण वहीं से प्रारम्भ होता है ,” उसने उत्तर दिया।
“तो फिर तुम जगते कितने बजे हो?” रमेश बाबू ने पूछा ।
“ढाई बजे…. फिर साढ़े तीन तक वहाँ पहुँच जाता हूँ।”
“फिर ?” रमेश बाबू ने जानना चाहा ।
“फिर लगभग सात बजे अख़बार बाँटकर घर वापस आकर सो जाता हूँ….. फिर दस बजे कार्यालय…… अब बच्चों को बड़ा करने के लिए ये सब तो करना ही होता है।”
रमेश बाबू कुछ पलों तक उसकी ओर देखते रह गए और फिर बोले, “ठीक! तुम्हारे बहुमूल्य सुझाव को अवश्य ध्यान में रखूँगा।”
घटना को लगभग पन्द्रह वर्ष बीत गये।
एक दिन प्रात: नौ बजे के लगभग वह अखबार वाला रमेश बाबू के आवास पर आकर एक निमंत्रण-पत्र देते हुए बोला, “बाबू जी! बिटिया का विवाह है….. आप को सपरिवार आना है।“
निमंत्रण-पत्र के आवरण में अभिलेखित सामग्री को रमेश बाबू ने सरसरी निगाह से जो पढ़ा तो संकेत मिला कि किसी डाक्टर लड़की का किसी डाक्टर लड़के से परिणय का निमंत्रण था। तो जाने कैसे उनके मुँह से निकल गया, “तुम्हारी लड़की ?”
उसने भी जाने उनके इस प्रश्न का क्या अर्थ निकाल लिया कि विस्मय के साथ बोला, “कैसी बात कर रहे हैं, बाबू जी! मेरी ही बेटी।”
रमेश बाबू अपने को सम्भालते हुए और कुछ अपनी झेंप को मिटाते हुए बोले , “नहीं! मेरा तात्पर्य कि अपनी लड़की को तुम डाक्टर बना सके, इसी प्रसन्नता में वैसा कहा।“
“हाँ बाबू जी! मेरी लड़की ने एमबीबीएस किया है और उसका होने वाला पति भी एमडी है ……. और बाबू जी! मेरा लड़का इंजीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का छात्र है।”
रमेश बाबू किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े सोच रहे थे कि उससे अन्दर आकर बैठने को कहूँ कि न कहूँ कि वह स्वयम् बोला, “अच्छा बाबू जी! अब चलता हूँ….. अभी और कई कार्ड बाँटने हैं…… आप लोग आइयेगा अवश्य।”
रमेश बाबू ने भी फिर सोचा… आज अचानक अन्दर बैठने को कहने का आग्रह मात्र एक छलावा ही होगा। अत: औपचारिक नमस्ते कहकर उन्होंने उसे विदाई दे दी।
उस घटना के दो वर्षों के बाद जब वह पुनः रमेश बाबू के आवास पर आया तो ज्ञात हुआ कि उसका बेटा जर्मनी के किसी नामी कंपनी में कहीं कार्यरत था।
उत्सुक्तावश रमेश बाबू ने उससे प्रश्न कर ही डाला कि आखिर उसने अपनी सीमित आय में रहकर अपने बच्चों को वैसी उच्च शिक्षा कैसे दे डाली?
उसने कहना शुरू किया….“बाबू जी! इसकी बड़ी लम्बी कथा है , फिर भी कुछ आपको बताए देता हूँ। अख़बार, नौकरी के अतिरिक्त भी मैं ख़ाली समय में कुछ न कुछ कमा लेता था । साथ ही अपने दैनिक व्यय पर इतना कड़ा अंकुश कि भोजन में सब्जी के नाम पर रात में बाज़ार में बची खुची कद्दू, लौकी, बैंगन जैसी मौसमी सस्ती-मद्दी सब्जी को ही खरीदकर घर पर लाकर बनायी जाती थी। एक दिन मेरा लड़का परोसी गयी थाली की सामग्री देखकर रोने लगा और अपनी माँ से बोला, ‘ये क्या रोज़ बस वही कद्दू, बैंगन, लौकी, तरोई जैसी नीरस सब्ज़ी… रूख़ा-सूख़ा ख़ाना…… ऊब गया हूँ इसे खाते-खाते। अपने मित्रों के घर जाता हूँ तो वहाँ मटर-पनीर, कोफ़्ते, दम आलू आदि….। और यहाँ कि बस क्या कहूँ!!‘”
मैं सब सुन रहा था तो रहा न गया और मैं बड़े उदास मन से उसके पास जाकर बड़े प्यार से उसकी ओर देखा और फिर बोला, “पहले आँसू पोंछ फिर मैं आगे कुछ कहूँ।”
मेरे ऐसा कहने पर उसने अपने आँसू स्वयम् पोछ लिये। फिर मैं बोला, *”बेटा! सिर्फ़ अपनी थाली देख। दूसरे की देखेगा तो तेरी अपनी थाली भी चली जायेगी…… और सिर्फ़ अपनी ही थाली देखेगा तो क्या पता कि तेरी थाली किस स्तर तक अच्छी होती चली जाये। इस रूख़ी-सूख़ी थाली में मैं तेरा भविष्य देख रहा हूँ। इसका अनादर मत कर। इसमें जो कुछ भी परोसा गया है उसे मुस्करा कर खा ले ….।”
उसने फिर मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और जो कुछ भी परोसा गया था खा लिया। उसके बाद से मेरे किसी बच्चे ने मुझसे किसी भी प्रकार की कोई भी माँग नहीं रखी । बाबू जी! आज का दिन मेरे बच्चों के उसी त्याग औऱ तपस्या का परिणाम है।
उसकी बातों को रमेश बाबू बड़ी तन्मयता के साथ लगातार चुपचाप सुनते रहे औऱ बस यही सोचते रहे कि आज के बच्चों की कैसी मानसिकता है कि वे अपने अभिभावकों की हैसियत पर दृष्टि डाले बिना उन पर लगातार अपनी ऊटपटाँग माँगों का दबाव डालते रहते हैं….।
💐💐शिक्षा💐💐
बच्चों, अपने माता पिता के साथ हमेशा अछ्या व्यवहार करके ही आप अपने जीवन के लक्ष्यों को हासिल कर सकते है।उनसे ऐसी किसी प्रकार की मांग ना करें जो वो पूरी नही कर सकते,साथ ही माता पिता की भी जिम्मेदारी बनती है कि बच्चों पर ध्यान देवे की उनकी संगति कैसी है।
सदैव प्रसन्न रहिये।
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।