होशियार गुरुजी की सबसे बड़ी भूल


विद्यालय में यदि आपने गलती से यह साबित कर दिया कि आपको काम करना आता है, तो समझ लीजिए आपने अपने पैरों पर नहीं, सीधे अपने कंधों पर कुल्हाड़ी मार ली।

इस संसार में प्रतिभा का सम्मान हर जगह नहीं होता। कुछ जगह उसका पूरा दोहन होता है। विद्यालय भी कभी-कभी ऐसी ही प्रयोगशाला बन जाता है।

यहाँ दो तरह के शिक्षक सबसे अधिक सुखी पाए जाते हैं। पहले वे, जिन्हें कुछ नहीं आता; दूसरे वे, जिन्हें सब कुछ आता है, पर वे इस कला में पीएच.डी. कर चुके होते हैं कि कभी किसी को पता न चलने पाए कि उन्हें कुछ आता भी है।

दुर्भाग्य से तीसरी प्रजाति भी होती है—होशियार गुरुजी। यही विद्यालय के सबसे बड़े “राष्ट्रीय संसाधन” घोषित कर दिए जाते हैं।

पहले दिन कोई कहता है—”गुरुजी, आपको कंप्यूटर अच्छा आता है न?”

दूसरे दिन—”ऑनलाइन पोर्टल भी आप ही संभाल लीजिए।”

तीसरे दिन—”आईवीआरएस की कॉल भी आप उठा लिया करो।”

चौथे दिन—”गणित-विज्ञान भी आपसे अच्छा कौन पढ़ाएगा!”

पाँचवें दिन—”आपकी हैंडराइटिंग बहुत सुंदर है, रजिस्टर भी आप ही लिख दीजिए।”

छठे दिन—”आपका भाषण तो कमाल का होता है, प्रार्थना सभा भी आप ही संभालिए।”

और सातवें दिन गुरुजी को पता चलता है कि वे शिक्षक कम, एकल-खिड़की समाधान केंद्र (Single Window System) अधिक बन चुके हैं।

विद्यालय में कोई पौधा सूख जाए तो गुरुजी जिम्मेदार।वाई-फाई बंद हो जाए तो गुरुजी जिम्मेदार।अंग्रेज़ी का पत्र आ जाए तो गुरुजी।निरीक्षण आ जाए तो गुरुजी।कार्यक्रम हो तो गुरुजी।अभिभावक नाराज़ हों तो गुरुजी।बच्चा पुरस्कार जीत जाए तो विद्यालय का नाम।कुछ गड़बड़ हो जाए तो—”गुरुजी, ज़रा इधर आइए…”

सबसे अद्भुत दृश्य तब होता है जब काम सौंपने वाले कहते हैं—”यह काम तो आपके अलावा कोई कर ही नहीं सकता।”

यह वाक्य सुनने में सम्मान जैसा लगता है, पर अनुभवी लोग जानते हैं कि यह वास्तव में अतिरिक्त काम का नियुक्ति-पत्र होता है।

उधर कोने की कुर्सी पर विराजमान अनुभवी महापुरुष बड़ी शांति से मुस्कुराते रहते हैं। उन्होंने जीवन का परम ज्ञान प्राप्त कर लिया है—”जितना कम दिखाई दोगे, उतना कम बुलाए जाओगे।”

उन्होंने अपनी प्रतिभा पर ऐसा पर्दा डाल रखा है कि वर्षों की सेवा के बाद भी किसी को संदेह नहीं होता कि वे क्या-क्या कर सकते हैं।

बेचारे होशियार गुरुजी दिन भर दौड़ते रहते हैं। कभी क्लर्क, कभी कंप्यूटर ऑपरेटर, कभी माली, कभी उद्घोषक, कभी अनुशासन प्रभारी, कभी डेटा एंट्री ऑपरेटर, तो कभी संकटमोचक।

शाम को जब वे थककर कुर्सी पर बैठते हैं, तब वही अनुभवी शिक्षक मुस्कुराकर पूछते हैं—”गुरुजी, आज बहुत बिजी रहे क्या?”

गुरुजी बस मुस्कुरा देते हैं, क्योंकि उन्हें अब समझ में आ चुका होता है कि विद्यालय में केवल काम करना ही पर्याप्त नहीं है; काम बाँटना भी एक कला है।

“संस्था तब महान बनती है जब जिम्मेदारियाँ व्यक्ति की योग्यता देखकर नहीं, बल्कि न्याय और सहभागिता के आधार पर बाँटी जाती हैं। योग्यता का पुरस्कार अतिरिक्त बोझ नहीं, सम्मान और सहयोग होना चाहिए।”

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