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“जिस क्षण आप हर समय खुश रहने की अपेक्षा छोड़ देते हैं, उसी क्षण आप जीवन को वास्तव में जीना शुरू करते हैं।” आज का युग शायद इतिहास का सबसे विचित्र युग है। पहले लोग जीवनजीते थे और कभी-कभी खुश हो जाते थे
आज लोग हर समय खुश रहने की कोशिश करते हैं और फिर भी भीतर से असंतुष्ट रहते हैं।
चारों ओर एक अदृश्य संदेश दिया जा रहा है—
“खुश रहो।” सोशल मीडिया हमें दिखाता है कि सब लोग खुश हैं। ,विज्ञापन बताते हैं कि यह वस्तु खरीद लो, खुशी मिल जाएगी।
अंक अच्छे आ जाएँ, खुशी मिल जाएगी।
,करी मिल जाए, खुशी मिल जाएगी।
बड़ा घर हो जाए, खुशी मिल जाएगी।
प्रशंसा मिल जाए, खुशी मिल जाएगी।
लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है? , कुछ समय के लिए शायद हाँ।*फिर मन किसी नई इच्छा, नई तुलना और नई अपेक्षा की ओर दौड़ पड़ता है। और खुशी फिर दूर खड़ी दिखाई देती है।
खुशी एक लक्ष्य नहीं, एक परिणाम है हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हमने खुशी को जीवन का लक्ष्य बना लिया है। वास्तव में खुशी कोई मंज़िल नहीं है।
यह तो अर्थपूर्ण जीवन जीने का एक स्वाभाविक परिणाम है।
एक माली जब पौधे लगाता है तो उसका उद्देश्य फूलों को खींचकर खिलाना नहीं होता।
वह मिट्टी तैयार करता है
पानी देता है।
धूप का ध्यान रखता है।
फिर एक दिन फूल अपने आप खिलते हैं।
ठीक वैसे ही खुशी को सीधे पकड़ने की कोशिश करने के बजाय हमें उन परिस्थितियों का निर्माण करना चाहिए जिनसे खुशी स्वाभाविक रूप से जन्म लेती है।
समस्या खुशी की कमी नहीं, अपेक्षाओं की अधिकता है आज अधिकांश लोग दुखी इसलिए नहीं हैं कि उनके जीवन में कुछ नहीं है। वे दुखी इसलिए हैं क्योंकि वे जीवन से बहुत अधिक अपेक्षा रखते हैं।
हम चाहते हैं—
बच्चे हमेशा आज्ञाकारी रहें।
परीक्षा में हमेशा अच्छे अंक आएँ।
कोई हमारी आलोचना न करे।
रिश्तों में कभी मतभेद न हो।
जीवन में कोई कठिनाई न आए।
लेकिन जीवन इन शर्तों पर नहीं चलता। जीवन में सफलता भी है, असफलता भी।
प्रशंसा भी है, आलोचना भी। , मिलन भी है, बिछड़ना भी।
जब हम जीवन से केवल सुख चाहते हैं और दुःख को अस्वीकार कर देते हैं, तभी संघर्ष शुरू होता है।
बच्चों को हमेशा खुश रहने की नहीं, जीवन जीने की शिक्षा दें
आज माता-पिता अनजाने में बच्चों को यह संदेश देते हैं कि दुःख, असफलता या निराशा बुरी चीजें हैं। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?
यदि बच्चा कभी असफल ही न हो तो धैर्य कैसे सीखेगा?
यदि उसे कभी निराशा न मिले तो संघर्ष की शक्ति कहाँ से आएगी
यदि उसने कभी हार न देखी हो तो जीत का मूल्य कैसे समझेगा?
जीवन की कठिनाइयाँ शत्रु नहीं हैं। वे चरित्र निर्माण की कार्यशाला हैं।
हस्ती स्कूल में हम मानते हैं कि बच्चों को केवल सफलता के लिए नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविकताओं के लिए तैयार करना चाहिए।
खुशी नहीं, अर्थ खोजिए
मनोविज्ञान के अनेक अध्ययनों ने यह सिद्ध किया है कि जो लोग खुशी का पीछा करते हैं वे अक्सर निराश होते हैं, जबकि जो लोग अर्थपूर्ण जीवन जीते हैं वे अधिक संतुष्ट रहते हैं।
अर्थ कहाँ मिलता है?
सीखने में
सृजन करने में
सेवा करने में
रिश्तों को निभाने में
समाज के लिए योगदान देने में
अपने कर्तव्य का पालन करने में
एक शिक्षक पढ़ाते समय हमेशा खुश नहीं होता, लेकिन उसे अपने कार्य में अर्थ मिलता है।
एक माता अपने बच्चे की देखभाल करते हुए थक जाती है, लेकिन उसे अपने जीवन का उद्देश्य मिलता है।
एक विद्यार्थी कठिन परिश्रम करता है, संघर्ष करता है, लेकिन उसी संघर्ष में उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
भारतीय दर्शन हमें क्या सिखाता है? भगवद्गीता का संदेश अत्यंत गहरा है।
श्रीकृष्ण अर्जुन से यह नहीं कहते कि हर समय खुश रहो।
वे कहते हैं— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन&।”
अर्थात् अपना कर्तव्य करो, परिणाम की चिंता मत करो। जब मन परिणाम से मुक्त होता है, तब चिंता कम होती है।
जब चिंता कम होती है, तब शांति आती है।
और शांति से ही वास्तविक आनंद जन्म लेता है।
खुशी नहीं, कृतज्ञता का अभ्यास करें
यदि आप खुश रहना चाहते हैं तो खुशी का पीछा मत कीजिए।कृतज्ञता का अभ्यास कीजिए।
हर दिन स्वयं से पूछिए—
मेरे जीवन में क्या अच्छा है?
मुझे किन लोगों का साथ मिला है?
मैंने आज क्या सीखा?
मैं किसके लिए आभारी हूँ?
कृतज्ञ व्यक्ति के जीवन में संतोष आता है। और संतोष से जो आनंद उत्पन्न होता है, वह किसी उपलब्धि से मिलने वाली क्षणिक खुशी से कहीं अधिक स्थायी होता है।
हस्ती पब्लिक स्कूल में हमारा विश्वास है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल सफल या खुश व्यक्ति बनाना नहीं है
हमारा उद्देश्य ऐसे विद्यार्थियों का निर्माण करना है जो—
जीवन की चुनौतियों का सामना कर सकें,
असफलताओं से सीख सकें,
दूसरों के प्रति संवेदनशील हों,&
अपने उद्देश्य को पहचान सकें,
और परिस्थितियों से ऊपर उठकर जीवन में अर्थ खोज सकें।
क्योंकि जीवन का लक्ष्य हर समय खुश रहना नहीं है
जीवन का लक्ष्य है—सीखना, बढ़ना, योगदान देना और अपने भीतर की श्रेष्ठता को अभिव्यक्त करना।
समापन
*शायद हमें अपने बच्चों से यह कहना बंद कर देना चाहिए—
“हमेशा खुश रहो।” और इसके स्थान पर यह कहना चाहिए—
“जीवन को पूरी तरह जीओ। खुशी आएगी, जाएगी। सफलता आएगी, जाएगी।
परन्तु यदि जीवन में उद्देश्य, कृतज्ञता, प्रेम, सेवा और आत्मस्वीकार हो, तो एक गहरी आंतरिक शांति विकसित होती है।
और वही शांति, वही संतोष, वही अर्थपूर्ण जीवन—सच्ची खुशी का आधार है।
हस्ती पब्लिक स्कूल एवं ज्यूनियर कॉलेज, दोंडाईचा
“खुशी का पीछा मत कीजिए; ऐसा जीवन बनाइए जिसमें खुशी स्वयं आपके द्वार पर आकर दस्तक दे।”